भारत में सरकारें अक्सर नसबंदी के 'टारगेट' तय करती थीं. ये चलन बंद हो गया.
इसके बजाय गर्भ निरोध के लिए गोलियों और दूसरे तरीक़ों के चलन को बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया. पिछले दो साल में भारत सरकार ने 'मिशन परिवार विकास' को लागू किया है.
इसमें गर्भ निरोध को हारमोन के ज़रिए रोकने की तीन प्रक्रियाओं का विकल्प दिया जाता है. इनमें से एक विकल्प प्रोजेस्टिन वाली गर्भ निरोधक गोलियां भी हैं.
वैसे गर्भ निरोध के लिए नसबंदी केवल भारत में ही लोकप्रिय हो, ऐसा भी नहीं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़े बताते हैं कि शादी-शुदा या यौन संबंध बनाने वाली कुल महिलाओं में से पहले जहां 20.5 फ़ीसद ये तरीक़ा अपनाती थीं.
वहीं अब ये तादाद घटकर 19 प्रतिशत रह गई है. भारत में इसके उलट हुआ है.
नसबंदी से गर्भधारण को रोकने वाली महिलाओं की तादाद 34 प्रतिशत से बढ़कर 39 फ़ीसद हो गई है. 2016 तक तो सरकार बाक़ायदा कैंप लगाकर नसबंदी अभियान चलाती थी. हालांकि अब ये कैंप लगने बंद हो गए हैं.
नसबंदी से गर्भ निरोध की प्रक्रिया को पलटा नहीं जा सकता. जबकि दूसरे विकल्पों में महिलाएं जब चाहें, तब उसे रोक सकती हैं. जैसे गोलियां खाना.
हालांकि, नसबंदी को सर्जरी से फिर से पलटा जा सकता है. लेकिन वो पेचीदा और मुश्किल ऑपरेशन है और ख़र्चीला भी. अक्सर ये नाकाम भी रहता है.
दुनिया भर में जो महिलाएं ये तय कर लेती हैं कि उन्हें और बच्चे नहीं चाहिए, उनके लिए गर्भ निरोध के लिए ऑपरेशन कराना सब से आसान और भरोसेमंद विकल्प है.
अमरीका में तो कई महिलाएं बच्चा होने के तुरंत बाद ये सर्जरी करा लेती हैं. वहीं कई महिलाएं कॉन्डम या दवाएं खाने के बाद सर्जरी से गर्भ निरोध करती हैं.
नसबंदी कराने के बाद महिलाओं को दोबारा गर्भ धारण की फिक्र नहीं होती. इसके साइड इफेक्ट भी नहीं हैं.
लेकिन जैसा कि छत्तीसगढ़ की शिव कुमारी और दूसरी महिलाओं के साथ हुआ, कई बार ऐसे ऑपरेशन असुरक्षित माहौल में होते हैं.
गनियारी के जन स्वास्थ्य सहयोग अस्पताल के निदेशक योगेश जैन कहते हैं कि जो हादसा नसबंदी कैंप के दौरान शिव कुमारी के साथ हुआ, वो होना तय था.
उनके मुताबिक़ ग़रीब महिलाओं के पास अक्सर विकल्प नहीं होते.
अक्सर ऐसे कैंपों में महिलाओं को एक इंसान नहीं, बल्कि महज़ गिनती के तौर पर जोड़ा जाता है. उनकी जान की कोई क़ीमत नहीं होती.
पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया ने छत्तीसगढ़ की घटना की पड़ताल में पाया कि नसबंदी शिविरों में आने के लिए महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने ऑपरेशन में ख़र्च होने वाली रक़म से बीस गुना ज़्यादा पैसे ख़र्च किए.
वहीं, ऑपरेशन कराने वाली हर महिला को 600 से रुपए के बीच दिए गए.
2014 में हुई घटना के बाद केंद्र सरकार जागी और ऐसे शिविरों के हालात सुधारने की कोशिश की गई.
पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की सोनल शर्मा कहती हैं कि भारत सरकार ने उनके सुझाव को मानकर नसबंदी के लिए शिविर लगाने बंद कर दिए हैं.सके बजाय अब महिलाओं को अगर नसबंदी करानी होती है, तो उन्हें हफ़्ते के तयशुदा दिनों में सरकारी अस्पताल जाना होता है.
इससे नसबंदी अभियानों की बेहतर निगरानी हो पा रही है. लेकिन मांग के अनुपात में नसबंदी की सुविधाओं में काफ़ी कमी देखी गई है.
छत्तीसगढ़ में ही मुंगेली ज़िला अस्पताल में एक सर्जन नसबंदी के लिए हफ़्ते में दो बार आता है.
हफ़्ते भर में 20 महिलाओं की ही सर्जरी हो पाती है. जबकि ऐसी सर्जरी की मांग काफ़ी ज़्यादा है.
अब अगर हादसे के बावजूद छत्तीसगढ़ की महिलाएं गर्भ निरोध के लिए नसबंदी को ही तरज़ीह देती हैं, तो मतलब साफ़ है. महिलाओं की नज़र में ये परिवार नियोजन का सबसे अच्छा तरीक़ा है. हालांकि इसकी प्रक्रिया अब भी विवादों के घेरे में ही है.
भले ही नसबंदी के ऑपरेशन साफ़-सुथरे माहौल में किए जाएं, फिर भी ये सर्जरी जोखिम से भरपूर है. ये महिला की निजता पर हमला भी है.
तमाम विवादों के बावजूद मर्दों के मुक़ाबले महिलाओं की नसबंदी कई देशों में ज़्यादा लोकप्रिय है.
विवाद इस बात को लेकर भी है कि नसबंदी के बाद महिला के गर्भ धारण के विकल्प हमेशा के लिए ख़त्म हो जाते हैं. इससे नैतिकता के भी सवाल उठते हैं. सरकारों ने इस विकल्प का दुरुपयोग भी किया है.
पेरू में 1990 के दशक में गरीब महिलाओं की बड़े पैमाने पर नसबंदी उन्हें बिना बताए कर दी गई थी.
इस विकल्प को लेकर एक मुश्किल ये भी है कि महिलाओं पर गर्भ निरोध के लिए नसबंदी का दबाव बनाने से उनके सामने मौजूद दूसरे विकल्पों को ख़त्म कर दिया जाता है.
जबकि वो गोलियां खाने या आईयूडी लगाने जैसे अस्थायी विकल्प अपनाने की भी हक़दार हैं.
अगर उनके पास ये विकल्प नहीं होते, तो, वो या तो गर्भ निरोध के लिए नसबंदी कराएं या फिर जल्दी-जल्दी बच्चे पैदा होने का डर रहता है.
भारत में गर्भ निरोधक गोलियों और आईयूडी की उपलब्धता भी कम है. अगर महिलाएं आईयूडी इस्तेमाल करना भी चाहें, तो इसे सही तरीक़े से लगाने के विशेषज्ञों की भी कमी है.
जानकारी के अभाव में महिलाओं को गर्भ निरोध के तमाम विकल्प नहीं मिल पाते हैं.
मधु गोयल दिल्ली के पॉश इलाक़े ग्रेटर कैलाश स्थित फोर्टिस ला फेम अस्पताल में गाइनेकोलॉजिस्ट हैं.
उनके पास रईस तबक़े की महिलाएं आती हैं. समाज के इस वर्ग की महिलाओं के बीच भी गर्भ निरोध के लिए नसबंदी ही ज़्यादा लोकप्रिय है.
हालांकि नसबंदी कराने वाली ज़्यादातर ऐसी महिलाएं उम्रदराज़ होती हैं. युवा महिलाएं भी गर्भ निरोध के दूसरे विकल्पों को लेकर आशंकित होती हैं.
इंटरनेट पर गर्भ निरोधक गोलियों के बारे में पढ़कर जानकारी लेने आई महिलाएं भी मधु गोयल को आशंकित दिखीं.
बहुत सी महिलाओं को ये ग़लतफ़हमी है कि गर्भ निरोधक गोलियां उन्हें स्थायी तौर पर बांझ बना सकती हैं.
मधु गोयल कहती हैं कि अच्छी बात ये है कि महिलाएं अब ख़ुद से जागरूक हो रही हैं. गर्भ निरोधक अपना रही हैं. भारत में तलाक़ के मामले भी बढ़ रहे हैं. इसी वजह से भारत में कई महिलाएं नसबंदी को पलटना भी चाहती हैं, ताकि दूसरे पति के साथ नए सिरे से परिवार शुरू कर सकें.
महिला और बाल कल्याण मंत्रालय ने 2016 में नेशनल पॉलिसी फॉर वुमेन को शुरू किया था.
इसमें गर्भ निरोध के लिए महिलाओं के बजाय अब पुरुषों पर ज़्यादा ज़ोर देने की बात कही गई है. हालांकि अभी इस नीति पर पूरी तरह से अमल नहीं शुरू हो सका है. जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता के साथ भारत में महिलाओं की नसबंदी लोकप्रिय है, उस सोच में बदलाव आने में काफ़ी वक़्त लगेगा.
इसके बजाय गर्भ निरोध के लिए गोलियों और दूसरे तरीक़ों के चलन को बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया. पिछले दो साल में भारत सरकार ने 'मिशन परिवार विकास' को लागू किया है.
इसमें गर्भ निरोध को हारमोन के ज़रिए रोकने की तीन प्रक्रियाओं का विकल्प दिया जाता है. इनमें से एक विकल्प प्रोजेस्टिन वाली गर्भ निरोधक गोलियां भी हैं.
वैसे गर्भ निरोध के लिए नसबंदी केवल भारत में ही लोकप्रिय हो, ऐसा भी नहीं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के आंकड़े बताते हैं कि शादी-शुदा या यौन संबंध बनाने वाली कुल महिलाओं में से पहले जहां 20.5 फ़ीसद ये तरीक़ा अपनाती थीं.
वहीं अब ये तादाद घटकर 19 प्रतिशत रह गई है. भारत में इसके उलट हुआ है.
नसबंदी से गर्भधारण को रोकने वाली महिलाओं की तादाद 34 प्रतिशत से बढ़कर 39 फ़ीसद हो गई है. 2016 तक तो सरकार बाक़ायदा कैंप लगाकर नसबंदी अभियान चलाती थी. हालांकि अब ये कैंप लगने बंद हो गए हैं.
नसबंदी से गर्भ निरोध की प्रक्रिया को पलटा नहीं जा सकता. जबकि दूसरे विकल्पों में महिलाएं जब चाहें, तब उसे रोक सकती हैं. जैसे गोलियां खाना.
हालांकि, नसबंदी को सर्जरी से फिर से पलटा जा सकता है. लेकिन वो पेचीदा और मुश्किल ऑपरेशन है और ख़र्चीला भी. अक्सर ये नाकाम भी रहता है.
दुनिया भर में जो महिलाएं ये तय कर लेती हैं कि उन्हें और बच्चे नहीं चाहिए, उनके लिए गर्भ निरोध के लिए ऑपरेशन कराना सब से आसान और भरोसेमंद विकल्प है.
अमरीका में तो कई महिलाएं बच्चा होने के तुरंत बाद ये सर्जरी करा लेती हैं. वहीं कई महिलाएं कॉन्डम या दवाएं खाने के बाद सर्जरी से गर्भ निरोध करती हैं.
नसबंदी कराने के बाद महिलाओं को दोबारा गर्भ धारण की फिक्र नहीं होती. इसके साइड इफेक्ट भी नहीं हैं.
लेकिन जैसा कि छत्तीसगढ़ की शिव कुमारी और दूसरी महिलाओं के साथ हुआ, कई बार ऐसे ऑपरेशन असुरक्षित माहौल में होते हैं.
गनियारी के जन स्वास्थ्य सहयोग अस्पताल के निदेशक योगेश जैन कहते हैं कि जो हादसा नसबंदी कैंप के दौरान शिव कुमारी के साथ हुआ, वो होना तय था.
उनके मुताबिक़ ग़रीब महिलाओं के पास अक्सर विकल्प नहीं होते.
अक्सर ऐसे कैंपों में महिलाओं को एक इंसान नहीं, बल्कि महज़ गिनती के तौर पर जोड़ा जाता है. उनकी जान की कोई क़ीमत नहीं होती.
पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया ने छत्तीसगढ़ की घटना की पड़ताल में पाया कि नसबंदी शिविरों में आने के लिए महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने ऑपरेशन में ख़र्च होने वाली रक़म से बीस गुना ज़्यादा पैसे ख़र्च किए.
वहीं, ऑपरेशन कराने वाली हर महिला को 600 से रुपए के बीच दिए गए.
2014 में हुई घटना के बाद केंद्र सरकार जागी और ऐसे शिविरों के हालात सुधारने की कोशिश की गई.
पापुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की सोनल शर्मा कहती हैं कि भारत सरकार ने उनके सुझाव को मानकर नसबंदी के लिए शिविर लगाने बंद कर दिए हैं.सके बजाय अब महिलाओं को अगर नसबंदी करानी होती है, तो उन्हें हफ़्ते के तयशुदा दिनों में सरकारी अस्पताल जाना होता है.
इससे नसबंदी अभियानों की बेहतर निगरानी हो पा रही है. लेकिन मांग के अनुपात में नसबंदी की सुविधाओं में काफ़ी कमी देखी गई है.
छत्तीसगढ़ में ही मुंगेली ज़िला अस्पताल में एक सर्जन नसबंदी के लिए हफ़्ते में दो बार आता है.
हफ़्ते भर में 20 महिलाओं की ही सर्जरी हो पाती है. जबकि ऐसी सर्जरी की मांग काफ़ी ज़्यादा है.
अब अगर हादसे के बावजूद छत्तीसगढ़ की महिलाएं गर्भ निरोध के लिए नसबंदी को ही तरज़ीह देती हैं, तो मतलब साफ़ है. महिलाओं की नज़र में ये परिवार नियोजन का सबसे अच्छा तरीक़ा है. हालांकि इसकी प्रक्रिया अब भी विवादों के घेरे में ही है.
भले ही नसबंदी के ऑपरेशन साफ़-सुथरे माहौल में किए जाएं, फिर भी ये सर्जरी जोखिम से भरपूर है. ये महिला की निजता पर हमला भी है.
तमाम विवादों के बावजूद मर्दों के मुक़ाबले महिलाओं की नसबंदी कई देशों में ज़्यादा लोकप्रिय है.
विवाद इस बात को लेकर भी है कि नसबंदी के बाद महिला के गर्भ धारण के विकल्प हमेशा के लिए ख़त्म हो जाते हैं. इससे नैतिकता के भी सवाल उठते हैं. सरकारों ने इस विकल्प का दुरुपयोग भी किया है.
पेरू में 1990 के दशक में गरीब महिलाओं की बड़े पैमाने पर नसबंदी उन्हें बिना बताए कर दी गई थी.
इस विकल्प को लेकर एक मुश्किल ये भी है कि महिलाओं पर गर्भ निरोध के लिए नसबंदी का दबाव बनाने से उनके सामने मौजूद दूसरे विकल्पों को ख़त्म कर दिया जाता है.
जबकि वो गोलियां खाने या आईयूडी लगाने जैसे अस्थायी विकल्प अपनाने की भी हक़दार हैं.
अगर उनके पास ये विकल्प नहीं होते, तो, वो या तो गर्भ निरोध के लिए नसबंदी कराएं या फिर जल्दी-जल्दी बच्चे पैदा होने का डर रहता है.
भारत में गर्भ निरोधक गोलियों और आईयूडी की उपलब्धता भी कम है. अगर महिलाएं आईयूडी इस्तेमाल करना भी चाहें, तो इसे सही तरीक़े से लगाने के विशेषज्ञों की भी कमी है.
जानकारी के अभाव में महिलाओं को गर्भ निरोध के तमाम विकल्प नहीं मिल पाते हैं.
मधु गोयल दिल्ली के पॉश इलाक़े ग्रेटर कैलाश स्थित फोर्टिस ला फेम अस्पताल में गाइनेकोलॉजिस्ट हैं.
उनके पास रईस तबक़े की महिलाएं आती हैं. समाज के इस वर्ग की महिलाओं के बीच भी गर्भ निरोध के लिए नसबंदी ही ज़्यादा लोकप्रिय है.
हालांकि नसबंदी कराने वाली ज़्यादातर ऐसी महिलाएं उम्रदराज़ होती हैं. युवा महिलाएं भी गर्भ निरोध के दूसरे विकल्पों को लेकर आशंकित होती हैं.
इंटरनेट पर गर्भ निरोधक गोलियों के बारे में पढ़कर जानकारी लेने आई महिलाएं भी मधु गोयल को आशंकित दिखीं.
बहुत सी महिलाओं को ये ग़लतफ़हमी है कि गर्भ निरोधक गोलियां उन्हें स्थायी तौर पर बांझ बना सकती हैं.
मधु गोयल कहती हैं कि अच्छी बात ये है कि महिलाएं अब ख़ुद से जागरूक हो रही हैं. गर्भ निरोधक अपना रही हैं. भारत में तलाक़ के मामले भी बढ़ रहे हैं. इसी वजह से भारत में कई महिलाएं नसबंदी को पलटना भी चाहती हैं, ताकि दूसरे पति के साथ नए सिरे से परिवार शुरू कर सकें.
महिला और बाल कल्याण मंत्रालय ने 2016 में नेशनल पॉलिसी फॉर वुमेन को शुरू किया था.
इसमें गर्भ निरोध के लिए महिलाओं के बजाय अब पुरुषों पर ज़्यादा ज़ोर देने की बात कही गई है. हालांकि अभी इस नीति पर पूरी तरह से अमल नहीं शुरू हो सका है. जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता के साथ भारत में महिलाओं की नसबंदी लोकप्रिय है, उस सोच में बदलाव आने में काफ़ी वक़्त लगेगा.
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